(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

महाभारत का अरयण्क पर्व – Mahabharat Aranyak Parv in Hindi


॥ श्रीः ॥
3.154. अध्यायः 154
Mahabharata - Vana Parva - Chapter Topics
सौगन्धिकसरोविविक्षुं भीमंप्रति तद्रक्षिभिः क्रोधवशनामकै राक्षसैस्तच्चिकीर्षिप्रश्नः ॥ 1 ॥
Mahabharata - Vana Parva - Chapter Text

वैशम्पायन उवाच। 3-154-0x(2280)(21778)
स गत्वानलिनीं रम्यां राक्षसैरभिरक्षिताम्।
कैलासशिरे रम्ये ददर्श शुभकानने ॥ 3-154-1(21779)
कुबेरभुवनाभ्याशे जातां पर्वतनिर्झरैः।
सुरम्यां विपुलच्छायां नानाद्रुमलताकुलाम् ॥ 3-154-2(21780)
हरिताम्बुजसंछन्नां दिव्यां कनकपुष्कराम्।
नानापक्षिजनाकीर्णां सूपतीर्थामकर्दमाम् ॥ 3-154-3(21781)
अतीव रम्यां सुजलां जातां पर्वतसानुषु।
विचित्रभूतां लोकस्य शुभामद्भुतदर्शनाम् ॥ 3-154-4(21782)
तत्रामृतरसं शीतं लघु कुन्तीसुतः शुभम्।
ददर्शविमलं तोयं पिबंश्च बहु पाण्डवः ॥ 3-154-5(21783)
तां तु कपुष्करिणीं रम्यां दिव्यसौगन्धिकावृताम्।
जातरूपमयैः पद्मैश्छन्नां परमगन्धिभिः ॥ 3-154-6(21784)
वैडूर्यवरनालैश्च बहुचित्रैर्मनोरमैः।
हंसकारण्डवोद्धूतैः सृजद्भिरमलं रजः ॥ 3-154-7(21785)
आक्रीडं राजराजस् कुबेरस्य महात्मनः।
गन्धर्वैरप्सरोभिश्च देवैश्च परमार्चिताम् ॥ 3-154-8(21786)
सेवितामृषिभिर्दिव्यैर्यक्षैः किंपुरुषैस्तथा।
राक्षसैः किंनरैश्चापि गुप्तां वैश्रवणेन च ॥ 3-154-9(21787)
तां च दृष्ट्वैव कौन्तेयो भीमसेनो महाहलः।
बभूव परमप्रीतो दिव्यंप्रेक्ष्य सरो महत् ॥ 3-154-10(21788)
तच्च क्रोवशा नाम राक्षसा राजशासनात्।
रक्षन्ति शतसाहस्राश्चित्रायुधपरिच्छदाः ॥ 3-154-11(21789)
ते तु दृष्ट्वैव कौन्तेयमजिनैः परिवारितम्।
रुक्माङ्गदधरं वीरं भीमं भीमपराक्रमम् ॥ 3-154-12(21790)
सायुधं बद्धनिस्त्रिंशमशङ्कितमरिंदमम्।
पुष्करप्सुमुपायान्तमन्योन्यमभिचुक्रुशुः ॥ 3-154-13(21791)
अयं पुरुषशार्दूलः सायुधोऽजिनसंवृतः।
यच्चिकीर्षुरिह प्राप्तस्तत्संप्रष्टुमिहार्हथ ॥ 3-154-14(21792)
ततः सर्वे महाबाहुं समासाद्यवृकोदरम्।
तेजोयुक्तमपृच्छन्त कस्त्वमाख्यातुमर्हसि ॥ 3-154-15(21793)
मुनिवेषधरश्चैव सायुधश्चैव लक्ष्यसे।
यदर्थमाभिसंप्राप्तस्तदाचक्ष्यमहामते ॥ 3-154-16(21794)

इति श्रीमन्महाभारते अरण्यपर्वणि तीर्तयात्रापर्वणि चतुःपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ 154 ॥

Mahabharata - Vana Parva - Chapter Footnotes
3-154-3 सूपतीर्थां शोभनानि उपतीर्थानि तीराणि यस्यां सा ॥ 3-154-5 लघु आरोग्यकरम् ॥ 3-154-6 जातरूपं स्वर्णम् ॥ 3-154-8 आक्रीडं क्रीडास्थानम् ॥

 


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